डीपीआरओ के नोटिस के बाद भी कार्रवाई का इंतजार, अब लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लगाई गुहार, महिला सशक्तिकरण और जिला प्रशासन की कार्यशैली पर उठाए सवाल
प्रमोद कुमार वर्मा
अम्बेडकरनगर (अवधी खबर)। परिवार रजिस्टर में नाम दर्ज कराने और उसकी नकल पाने के लिए कथित तौर पर डेढ़ लाख रुपये मांगने तथा शारीरिक शोषण के आरोपों से जुड़ा मामला अब जिले की चौखट पार कर मुख्यमंत्री के जनता दरबार तक पहुंच गया है। जनपद के उच्चाधिकारियों से शिकायत करने और कार्रवाई की आस लगाए बैठी विधवा महिला शोभावती उपाध्याय ने आखिरकार लखनऊ पहुंचकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जनता दरबार में न्याय की गुहार लगाई है। लगातार शिकायतों के बावजूद न्याय न मिलने की पीड़ा अब महिला को राजधानी तक पहुंचने के लिए मजबूर कर रही है।
मामला भीटी ब्लॉक के नोकरापुर निवासी शोभावती उपाध्याय से जुड़ा है। उनके पति का निधन पांच अगस्त 2026 को हुआ था। पीड़िता का आरोप है कि पति की मृत्यु के बाद ससुराल के परिवार रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराने और उसकी नकल प्राप्त करने के लिए संपर्क करने पर एडीओ पंचायत प्रभात सिंह उर्फ हंस प्रकाश सिंह ने उनसे डेढ़ लाख रुपये की मांग की। महिला ने संबंधित अधिकारी पर शारीरिक शोषण का भी गंभीर आरोप लगाया है। पीड़िता का दावा है कि उसके पास बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग भी मौजूद है।
इस मामले में पीड़िता पहले पुलिस अधीक्षक से शिकायत कर चुकी हैं। इसके बाद 23 अक्टूबर को जिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र देकर न्याय की गुहार लगाई थी। मामला सामने आने और खबर प्रकाशित होने के बाद जिला पंचायत राज अधिकारी की ओर से संबंधित एडीओ पंचायत को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की जानकारी दी गई थी। लेकिन पीड़िता के मुताबिक, अब तक उन्हें अपेक्षित न्याय नहीं मिल सका है। इसी से निराश होकर उन्होंने मुख्यमंत्री के जनता दरबार का रुख किया।
बीते दिनों पीड़िता ने एक वीडियो वायरल कर आरोप लगाया था कि संबंधित एडीओ पंचायत का भाई बलरामपुर जनपद में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात है। पीड़िता को आशंका है कि इसी प्रभाव के चलते जिले के अधिकारी मामले में कार्रवाई करने से बच रहे हैं। हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना बाकी है।
इस पूरे प्रकरण ने महिला सशक्तिकरण और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ महिलाओं को सम्मान, सुरक्षा और त्वरित न्याय दिलाने की बात कही जाती है, वहीं दूसरी तरफ एक विधवा महिला को अपनी शिकायत लेकर अलग-अलग अधिकारियों के कार्यालयों से लेकर मुख्यमंत्री के जनता दरबार तक पहुंचना पड़ रहा है।
जनपद में महिला अधिकारियों के नेतृत्व में प्रशासनिक व्यवस्था संचालित होने के बावजूद एक पीड़िता को न्याय की गुहार के लिए राजधानी तक पहुंचना पड़ा, यह स्थिति व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है। सवाल यह भी है कि जब जिला स्तर पर शिकायतों के निस्तारण और महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए प्रशासनिक तंत्र मौजूद है, तो पीड़िता को बार-बार अपनी फरियाद लेकर दर-दर क्यों भटकना पड़ रहा है?
पीड़िता की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, आरोपों की सत्यता सामने लाई जाए और दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो। साथ ही परिवार रजिस्टर में उनका नाम दर्ज कराकर नियमानुसार नकल भी उपलब्ध कराई जाए।
अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री के जनता दरबार में पहुंची विधवा महिला की फरियाद पर प्रशासन कितनी गंभीरता दिखाता है और जिले के अधिकारी इस मामले में कब तक ठोस कदम उठाते हैं। क्या एक विधवा महिला को न्याय पाने के लिए मुख्यमंत्री दरबार तक पहुंचने के बाद ही राहत मिलेगी, या जिला प्रशासन अपनी जिम्मेदारी समझते हुए उसे स्थानीय स्तर पर ही न्याय दिलाएगा?




