मेडिकल कॉलेज में विशेषज्ञों ने मानसिक मरीजों को जागरूकता का दिया संदेश

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चिंता आज की सबसे सामान्य मानसिक स्वास्थ्य बीमारी

अवधी खबर संवाददाता

अम्बेडकरनगर। राजकीय एलोपैथिक मेडिकल कॉलेज में मानसिक रोग विभाग की ओर से अवसाद एवं चिंता विकार पर एक जन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर डॉ0 पारूल यादव (सहायक आचार्य) एवं डॉ0 सुधांशु चंदेल (सहायक आचार्य), डॉ0 पृथ्वी नाथ सिंह (सीनियर रेजिडेंट) एवं डॉ0 प्रियंका यादव (सीनियर रेजिडेंट) ने बताया कि अवसाद और चिंता आज की सबसे सामान्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है, जिनका समय एवं प्रभावी उपचार संभव है।

कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य उपस्थित मरीजों एवं उनके तीमारदारों को जागरूक करना है कि बढ़ती मानसिक बीमारियां भी ब्लड प्रेशर, मधुमेह, त्वचा रोग या मिर्गी की तरह वास्तविक चिकित्सकीय स्थितियां हैं। इनका संबंध कमजोरी, इच्छा शक्ति की कमी या चरित्र दोष से नहीं होता। जिस प्रकार मधुमेह में दवा के साथ-साथ खान-पान और जीवन शैली पर ध्यान देना आवश्यक है, इस प्रकार मानसिक रोगों में दवा के साथ तनाव, प्रबंधन, पर्याप्त नींद, नियमित दिनचर्या और पारिवारिक सहयोग भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। डॉ0 पारूल यादव (सहायक आचार्य) मानसिक रोग विभाग ने स्पष्ट किया कि अवसाद के लक्षण केवल उदासी तक सीमित नहीं होते। अनेक मरीज सिर दर्द, शरीर में दर्द, थकान, नींद की समस्या, घबराहट, चिड़चिड़ापन, तथा अन्य शारीरिक शिकायतों के साथ भी प्रस्तुत हो सकते हैं।

इसी प्रकार चिंता विकार में अत्यधिक चिंता, बेचैनी, घबराहट, हृदय गति तेज होना, पसीना आना, नींद न आना तथा पैनिक अटैक जैसे लक्षण देखे जा सकते हैं। डॉ0 सुधांशु चंदेल (सहायक आचार्य) मानसिक रोग विभाग ने कार्यक्रम में बताया कि मानसिक रोगों की दवाओं को कभी भी अचानक बंद नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे रोग पुनः बढ़ सकता है या लक्षण अधिक गंभीर रूप में लौट सकते हैं। मरीज को यह भी समझाया गया कि अवसाद एवं चिंता की दवाओं का पूर्ण प्रभाव समानता दो से तीन सप्ताह या कभी-कभी उससे अधिक समय में दिखाई देता है।

इसलिए उपचार के प्रारंभिक चरण में धैर्य रखना आवश्यक है। उपचार की शुरुआत में कुछ मरीजों को अधिक नींद, हल्की सुस्ती या अन्य मामूली दुष्प्रभाव महसूस हो सकते हैं। इसका यह अर्थ नहीं है की दवा केवल नींद की ही दवा है अथवा दवा काम नहीं कर रही है। मस्तिष्क पर कार्य करने वाली कई दवाओं के प्रारंभिक दिनों में ऐसी शिकायतें हो सकती हैं, जो समय के साथ कम हो जाती हैं। यदि अत्यधिक नींद या अन्य असुविधा हो, तो मरीज स्वयं दवा बंद न करें, बल्कि चिकित्सक से परामर्श लें। इस अवसर पर कार्यक्रम में यह भी सुनिश्चित किया कि जैसे मधुमेह के मरीज में दवा लेने के बावजूद खान-पान में लापरवाही से शुगर बढ़ सकती है, उसी प्रकार अवसाद, चिंता या अन्य मानसिक रोगों में दवा लेने के बावजूद अत्यधिक तनाव, पारिवारिक या सामाजिक दबाव, नींद की कमी अथवा जीवन की कठिन परिस्थितियों के कारण लक्षण बढ़ सकते हैं।

ऐसे ही समय में दवा बंद करने के बजाय चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए, ताकि उचित उपचार लिया जा सके। कार्यक्रम के अंत में लोगों से यह अपील की गई की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को छुपाने या शर्म का विषय न समझे। समय पर पहचान, नियमित उपचार और सकारात्मक सहयोग से अधिकांश मरीज पूर्णतः सामान्य एवं स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।


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