महामाया मेडिकल कॉलेज की लापरवाही उजागर — एक्सपायरी इंजेक्शन फेंकते फोटो वायरल, प्रशासन पर उठे गंभीर सवाल

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अवधी खबर संवाददाता

अंबेडकरनगर।
कभी जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने के लिए स्थापित किया गया महामाया मेडिकल कॉलेज अब खुद बदहाल व्यवस्था और लापरवाही की मिसाल बनता जा रहा है। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल एक फोटो ने कॉलेज प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वायरल तस्वीर में कॉलेज परिसर के भीतर एक्सपायरी हो चुके इंजेक्शन और दवाओं को फेंका हुआ देखा जा सकता है।

बताया जा रहा है कि यह फोटो महामाया मेडिकल कॉलेज अस्पताल परिसर का ही है। इस दृश्य ने न केवल कॉलेज प्रशासन की बेपरवाही उजागर की है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर जनता के भरोसे को भी गहरा झटका दिया है। एक ओर मरीजों को आवश्यक दवाओं के अभाव में बाहर से दवा खरीदने की सलाह दी जाती है, वहीं दूसरी ओर अस्पताल परिसर में एक्सपायरी इंजेक्शन का ढेर देखा जा रहा है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह फोटो कैंटीन या स्टोर रूम के आसपास का है, जहां कचरा प्रबंधन की भी कोई व्यवस्था नहीं दिखाई दी। लोगों का यह भी कहना है कि पूर्व प्रधानाचार्य के कार्यकाल में अस्पताल की स्थिति काफी सुधरी थी, लेकिन वर्तमान प्रधानाचार्य डॉ. मुकेश यादव के पदभार संभालने के बाद से कॉलेज की हालत महामाया के नाम पर भ्रम का प्रतीक बन गई है।

हाल ही में मीडिया से बातचीत में प्रधानाचार्य डॉ. मुकेश यादव ने दावा किया था कि “महामाया मेडिकल कॉलेज पूरे जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था को सशक्त करेगा। लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिख रही है — दवाओं की कमी, स्टाफ की अनुपस्थिति और बुनियादी सुविधाओं का अभाव यहां आम बात बन गई है।

एक मरीज के परिजन ने बताया, हमारे बच्चे को इंजेक्शन की जरूरत थी, पर अस्पताल में दवा नहीं मिली। बाहर से खरीदने को कहा गया। अब तस्वीरें देखकर समझ आ गया कि यहां एक्सपायरी इंजेक्शन पड़े सड़ रहे हैं।

स्थानीय चिकित्सक संघ के एक सदस्य ने भी चिंता जताते हुए कहा कि एक्सपायरी दवाओं का फेंका जाना यह दर्शाता है कि खरीद प्रणाली में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार हो सकता है। सरकार को तत्काल जांच के आदेश देने चाहिए।

जिले के अन्य सरकारी अस्पतालों से भी ऐसी ही शिकायतें सामने आ रही हैं, जहां मरीजों को सामान्य इलाज के लिए भी भटकना पड़ रहा है। नतीजतन, जनता मजबूरी में निजी अस्पतालों का सहारा ले रही है, जिससे गरीब वर्ग पर आर्थिक बोझ बढ़ता जा रहा है।

यह घटना उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के लिए एक गंभीर चेतावनी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ऐसी लापरवाही पर रोक नहीं लगी, तो सरकारी अस्पतालों पर जनता का भरोसा पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।


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