गुणवत्ताविहीन शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों का कचरा

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अंबेडकरनगर।प्रख्यात दार्शनिक सुकरात के शब्दों में शिक्षक जहां जन्मजात होते हैं तो शिक्षा मनोवैज्ञानिक स्किनर भी कुछ कुछ सुकरात के नक्शेकदम पर चलते हुए शिक्षण कला को जन्मना स्वीकार करते हुए प्रशिक्षण द्वारा योग्य शिक्षक निर्माण की अवधारणा को गौण करार देते हैं।हालांकि मनोवैज्ञानिक भाटिया और सफाया तथा अन्यान्य शिक्षादार्शनिक शिक्षकों के भीतर जन्मजात अद्वितीय कला होने के साथ ही साथ उनको मिलने वाले सतत प्रशिक्षण की वकालत करते हैं।कदाचित इसी अवधारणा को आधार मानकर स्वाधीनता प्राप्ति के उपरांत भारत में शिक्षकों के प्रशिक्षण का जिम्मा विश्वविद्यालयों और राज्याधीन प्रशिक्षण महाविद्यालयों को सुपुर्द किया गया था किंतु वर्ष 1998 से जनसहभागिता के आधार पर निजी संस्थानों को जिसतरह से शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थान खोलने और संचालित करने का अधिकार सूबाई और केंद्र की सरकारों ने दिया है,कहना अनुचित नहीं होगा कि तबसे आजतक शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान छात्राध्यापकों से सुविधाओं के नामपर महज उगाही तक ही सीमित होकर रह गए हैं।

लिहाजा प्रशिक्षण की उपाधि प्राप्त किन्तु प्रशिक्षण की बारीकियों से हीन शिक्षकों का बड़ा तबका आज विद्यालयों और विद्यार्थियों के लिए प्लास्टिक के कचरे से अधिक और कुछ नहीं है।शिक्षा में गुणवत्ता की कमी का यह एक प्रमुखतम कारण भी है।
उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में यह बात दिलचस्प है कि वर्ष 1998 तक यहां राज्य के विश्वविद्यालयों व एल. टी. ट्रेनिंग कॉलेजों के मार्फ़त ही शिक्षकों का प्रशिक्षण आयोजित किया जाता था।बेसिक शिक्षा परिषद के अधीन विद्यालयों में शिक्षकों की प्रतिपूर्ति हेतु जिला शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान तथा रजिस्ट्रार,विभागीय परीक्षाएं,उत्तर प्रदेश द्वारा बीटीसी व सीटी की परीक्षाओं का आयोजन और प्रशिक्षण किया जाता था।यह वह दौर था जबकि प्रदेशभर में महज कुल 11 एल टी कॉलेजों में 1050 सीटों के लिए प्रवेश पाने के इच्छुक तीन से चार लाख स्नातक प्रतिवर्ष प्रवेश परीक्षा में सम्मिलित हुआ करते थे औरकि लिखित परीक्षा में महज उत्तीर्ण हुए परीक्षार्थियों की संख्या 5050 हुआ करती थी।

इतना ही नहीं लिखित परीक्षाओं के पश्चात प्रति पांच पर एक कि अवधारणा के साथ जोरदार साक्षात्कार भी होता था।जिसमें शिक्षा विभाग के विद्वान अधिकारी व शिक्षाशास्त्रियों को विशेषज्ञ के तौर पर साक्षात्कार बोर्ड का सदस्य बनाया जाता था।तब एल टी प्रशिक्षण का इतना महत्त्व था कि आज भी स्नातक वेतनक्रम में नियुक्त शिक्षकों के वेतनक्रम को एलटी ग्रेड कहा जाता है।इस प्रशिक्षण को प्राप्त शिक्षक आज भी दुनियां भर में अपनी अपनी ख्याति अर्जित कर रहे हैं औरकि एक भी एलटी प्रशिक्षित स्नातक आजतक बेरोजगार नहीं मिलता।इसीतरह विश्वविद्यालयों के अधीन प्रशिक्षण महाविद्यालय भी इतने गुणवत्तापूर्ण और प्रशिक्षण के प्रति सजग थे कि संस्थानों के नाम लेनेमात्र से शिक्षकों की गुणवत्ता का आभास होता था।दुर्भाग्य से आज ऐसे संस्थान खोजने से भी नहीं मिलते।

आखिर क्यों?यह अनुत्तरित प्रश्न है।जिसका उत्तर आज नहीं तो कल नीतिनिर्माताओं को देना ही होगा।यदि ऐसा नहीं होता तो यह देश के प्रति किसी घात से कम नहीं होगा। शिक्षक-प्रशिक्षण महाविद्यालयों को मान्यता,उनकी गुणवत्ता और उनके मानवीय संसाधनों की निगरानी हेतु यद्यपि केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की स्थापना की गई है किंतु यह हाथी के सफेद दांत से इतर और कुछ नहीं है।

हालात यहां तक बदतर हैं कि दिल्ली और बंगाल,उड़ीसा,महाराष्ट्र में नौकरीशुदा व्यक्ति भी आज उत्तर प्रदेश के संस्थानों से पैसे के बलपर बीएड की ट्रेनिंग कर रहे हैं।सूरतेहाल तो इतने खराब हो चुके हैं कि प्रशिक्षण महाविद्यालय घर घर खोजकर प्रवेश ले रहे हैं और प्रवेश के समय ही प्रयोगात्मक परीक्षाओं में बढ़िया अंक मिलने,उपस्थिति की अनिवार्यता न होने और परीक्षाओं में धड़ल्ले से बोलवाकर नकल कराने का भी जिम्मा लेते हुए देखे जा सकते हैं।आखिर इन हालातों की सूचना क्या सरकारी तंत्रों या फिर एनसीटीई को नहीं है,यह सोचनीय है,चिंतनीय है।


वस्तुतः राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद,नई दिल्ली और उसके निर्देशों पर बने पर्यवेक्षण अधिकारी तथा विश्वविद्यालयों के जिम्मेदार कर्ताधर्ता सभी के सभी आज पैसे की चाहत में शिक्षा को कबाड़ियों के हाथ बेचने लगे है।

अभिभावक और प्रवेशार्थी छात्र भी ऐसे ही संस्थानों को खोजने में ज्यादा मशगूल दिखते हैं जहां की बिना गए,बिना पढ़े और बिना प्रयोगात्मक परीक्षाओं में शरीक हुए ही उनको बीएड तथा डीएलएड की उपाधि याकि प्रमाणपत्र मिल सकें।यही कारण है कि संस्थानों के प्रबंधन भी दिलखोलकर उगाही करने से बाज नहीं आते।परिणामस्वरूप ऐसे संस्थानों से प्रशिक्षित 95 प्रतिशत से अधिक छात्राध्यापक माइक्रो टीचिंग,शिक्षण कौशलों,पाठ योजना की खाशियतों व विभिन्न प्रकार की शिक्षण प्रविधियों से शतप्रतिशत शून्य होते हैं।

जिससे यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि ऐसे शिक्षकों द्वारा कक्षा शिक्षण को किसतरह रोचक बनाया जा सकता है?क्या ऐसे शिक्षक विद्यार्थियों के अंदर छिपे गुणों और उनकी आत्मशक्तियों का प्रस्फुटन कर सकने में सहायक हो सकते हैं?कदाचित कभी नहीं,कत्तई नहीं।


अब प्रश्न यह उठता है कि जब शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय उगाही के केंद्र बने हुए अपने मूल दायित्वों से इतर सिर्फ कागजी प्रशिक्षण आयोजित कर रहे हैं तो ऐसे संस्थानों को बाई क्यों मिलती है?क्यों इन संस्थानों की मानवीय व भौतिक सम्पदाओं,शुल्कआदि पर समाज व सरकारी तंत्र ध्यान न देकर मौन है?आखिर अखबारों के पत्रकार और टीवी चैनलों के संवाददाता आदि क्या इन खबरों से बेखबर हैं)क्या शिक्षक समुदाय भी जागरूक होकर अपने दायित्वों का सम्यक निर्वहन कर रहा है?आदि आदि प्रश्न आज शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालयों के ऊपर और स्वयम अपने भी सवालिया निशान लगाते हैं।

अतः समय रहते इन संस्थानों की गुणवत्ताविहीन स्थितियों की जांच और उचित कार्यवाही की जानी शिक्षा और समाज के हित में वक्त की अपरिहार्य आवश्यकता है।यदि समाज और सरकार इसमें असफल रहते हैं तो ऐसे संस्थान महज विद्यालयों में कचरा ही भेजेंगे।जिनसे राष्ट्रनिर्माण की उम्मीद करना व्यर्थ होगी।


उदयराज मिश्र
शैक्षिक सलाहकार व शिक्षाविद


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