प्रधानाचार्य पर वेतन घोटाला सिद्ध, फिर भी मुकदमा दर्ज नहीं! विभाग की भूमिका संदिग्ध

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दो विभागों से एक ही अवधि में वेतन लेने का मामला

शिक्षा विभाग ने अब तक सिर्फ राशि लौटाने का आदेश दिया, कानूनी कार्यवाही से परहेज क्यों?

अयोध्या/अंबेडकरनगर (प्रमोद वर्मा)।
रामबली नेशनल इंटर कॉलेज, गोसाईगंज, अयोध्या के कार्यवाहक प्रधानाचार्य सरोज कुमार दूबे के खिलाफ दर्ज शिकायत में यह स्पष्ट रूप से सामने आया है कि उन्होंने दिसंबर 1990 और जनवरी 1991 के दौरान शिक्षा विभाग और स्वास्थ्य विभाग दोनों से वेतन प्राप्त किया। यह दोहरे भुगतान (डबल वेतन) का गंभीर मामला है, जो सरकारी धन की धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है।

शिकायतकर्ता कामता प्रसाद, शिक्षक, गंगादीन गौरीशंकर इंटर कॉलेज, कानपुर द्वारा 29 जून 2025 को की गई शिकायत (ऑनलाइन जनसुनवाई संख्या: 40017725038025) में इस प्रकरण को विस्तार से उठाया गया। शिकायत के साथ वर्ष 2018 में मुख्य चिकित्सा अधिकारी अयोध्या द्वारा जारी एक पुराना पत्र भी संलग्न था, जिसमें यह जानकारी पहले ही मौजूद थी कि श्री दूबे को उक्त अवधि में स्वास्थ्य विभाग से वेतन मिला था।

शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार सरोज कुमार दूबे ने उसी अवधि (15 दिसंबर 1990 से जनवरी 1991 तक) में रामबली नेशनल इंटर कॉलेज, गोसाईगंज में सहायक अध्यापक के रूप में कार्यभार ग्रहण कर राजकोष से वेतन भी प्राप्त किया। यानि एक ही समय में दो स्थानों से वेतन लिया गया।

जब दोष प्रमाणित हो चुका, तो मुकदमा क्यों नहीं?

इस पूरे मामले की पुष्टि के बाद जिला विद्यालय निरीक्षक, अयोध्या द्वारा संस्था प्रबंधक को पत्र जारी कर केवल इतना कहा गया कि सरोज कुमार दूबे से प्राप्त वेतन राशि राजकोष में जमा कराई जाए तथा इस पर आख्या प्रस्तुत की जाए।

लेकिन सवाल यह है कि जब यह स्पष्ट हो चुका है कि यह वित्तीय अनियमितता और सरकारी राजस्व की दोहरी निकासी का मामला है, तो प्रशासन ने एफआईआर दर्ज कर कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं शुरू की?

ऐसे मामलों में आमतौर पर:

धारा 409 (सरकारी धन का दुरुपयोग), धारा 420 (धोखाधड़ी),

धारा 471 (जाली दस्तावेज का प्रयोग),

और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाती है।
लेकिन यहां विभाग ने केवल धन वापसी की बात कहकर कार्यवाही को टालने की कोशिश की है। यह साफ संकेत देता है कि कहीं न कहीं विभागीय संरक्षण दिया जा रहा है।

शिकायतकर्ता नहीं जताई नाराजगी

इस मामले को लेकर शिकायत करता कामता प्रसाद में नाराज़गी जताई है। उनका कहना है कि एक आम कर्मचारी पर यदि कुछ साक्ष्य भी मिल जाएं तो निलंबन और मुकदमा तुरंत होता है, फिर एक प्रधानाचार्य पर जब दोहरा वेतन लेने का लिखित और दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध हो चुका है, तो कार्यवाही क्यों नहीं?

शिक्षक संघों ने इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच के लिए स्वतंत्र एजेंसी से जांच, मुकदमा दर्ज करने और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की मांग की है।

विभाग की चुप्पी से शक और गहराया

अब तक जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय, अयोध्या की ओर से कोई भी स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं आया है कि मुकदमा क्यों नहीं दर्ज किया गया। यदि दोषी केवल पैसा जमा कर दे तो क्या यह भ्रष्टाचार के लिए लाइसेंस देना नहीं है?

अगर एक वरिष्ठ अधिकारी पर कार्यवाही नहीं होती, तो यह दूसरों को भी नियमों की अनदेखी करने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

निष्कर्ष:

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति के दोहरा वेतन लेने का नहीं है, यह सिस्टम की जवाबदेही, पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसे की परीक्षा है। यदि इस पर सख्त कार्यवाही नहीं होती, तो यह एक खतरनाक परंपरा की शुरुआत हो सकती है जहाँ सरकारी तंत्र में बैठे लोग कानून को ताक पर रखकर लाभ उठाते रहें।
जनता और मीडिया को चाहिए कि वे इस मामले को उठाकर निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करने में भूमिका निभाएं।


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