पुलिस ने दो आरोपियों को बताया मुख्य कड़ी, लेकिन सूत्रों का दावा—पूरे खेल के कथित सरगना तक अभी नहीं पहुंची जांच
अवधी खबर संवाददाता
अम्बेडकरनगर (प्रमोद वर्मा)। अकबरपुर क्षेत्र के बरियावन में रात के अंधेरे में जेसीबी से करीब 15 आशियाने ढहाए जाने के मामले ने अब नया मोड़ ले लिया है। मामला केवल मकान-दुकान तोड़े जाने या भूमि विवाद तक सीमित नजर नहीं आ रहा है। घटना के बाद जिले में जमीन की खरीद-फरोख्त, कथित अवैध प्लाटिंग, एग्रीमेंट के जरिए जमीन पर नियंत्रण और विवादित भूखंडों की सौदेबाजी के कथित नेटवर्क को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बरियावन में ऐसी स्थिति क्यों पैदा हुई कि विवादित भूमि को लेकर रात के समय जेसीबी पहुंची और लोगों को बंधक बनाकर करीब 15 आशियाने देखते ही देखते ध्वस्त कर दिए गए? यदि भूमि को लेकर विवाद था तो क्या सक्षम प्राधिकारी का विधिक आदेश मौजूद था? संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिला था या नहीं? और यदि इस पूरी कार्रवाई के पीछे कोई व्यावसायिक अथवा जमीन से जुड़ा हित था तो उसकी जांच किस स्तर तक पहुंची?
दो आरोपियों तक सिमटी कार्रवाई या बड़े नेटवर्क की तलाश?
पुलिस ने मामले में दो आरोपियों को कार्रवाई की प्रमुख कड़ी के रूप में सामने रखा है। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक पूरे प्रकरण के पीछे बताए जा रहे कथित मुख्य सरगना तक पुलिस की जांच अभी नहीं पहुंच सकी है। सूत्रों का यह भी कहना है कि जमीन से जुड़े इस पूरे खेल में कई अन्य लोगों की भूमिका की पड़ताल जरूरी है। फिलहाल पुलिस ने अब तक इस मामले में मकान गिरने में प्रयुक्त 3 जेसीबी एक स्कॉर्पियो वाहन समेत 10 लोगों को जेल भेज चुकी है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि दो व्यक्ति इस पूरे मामले की प्रमुख कड़ी हैं तो क्या इनके पीछे किसी बड़े नेटवर्क की भूमिका है? जमीन किससे खरीदी गई, किसके नाम एग्रीमेंट हुआ, किन लोगों ने प्लाटिंग कराई, भूखंडों की बिक्री किस माध्यम से हुई और विवादित भूमि को लेकर किस किस स्तर पर संपर्क किया गया इन सभी सवालों का जवाब जांच से सामने आना जरूरी है।
यदि जांच केवल कुछ नामों तक सीमित रह गई तो उस कथित नेटवर्क की वास्तविक तस्वीर सामने आना मुश्किल होगा, जिसकी चर्चा घटना के बाद क्षेत्र में हो रही है।
पुलिस कार्रवाई पर भी उठ रहे सवाल
घटना के बाद पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं। पीड़ित पक्ष और स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा है कि मामले की तह तक जाने के बजाय जांच कहीं धीरे-धीरे सीमित दायरे में तो नहीं सिमट रही है।
हालांकि पुलिस की ओर से जांच जारी होने की बात कही जा सकती है, लेकिन सूत्रों का दावा है कि जिन लोगों को इस पूरे प्रकरण का कथित सरगना बताया जा रहा है, उन तक अभी पुलिस नहीं पहुंच पाई है। ऐसे में पुलिस के सामने चुनौती केवल आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पता लगाने की भी है कि इस पूरे घटनाक्रम की वास्तविक रूपरेखा क्या थी और इसके पीछे आर्थिक अथवा व्यावसायिक हित किस स्तर तक जुड़े हैं।
यदि कोई बड़ा नेटवर्क सामने आता है तो उसके वित्तीय लेनदेन, जमीन के दस्तावेज, एग्रीमेंट, रजिस्ट्री, प्लाटिंग का नक्शा, खरीदारों की सूची और संबंधित लोगों के बीच संपर्क की भी जांच आवश्यक होगी।
जिले के विभिन्न हिस्सों में कृषि भूमि को छोटे-छोटे भूखंडों में विभाजित कर बेचने की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। आरोप है कि कुछ मामलों में किसानों अथवा मूल खातेदारों से अपेक्षाकृत कम कीमत पर जमीन का एग्रीमेंट कराया जाता है और बाद में उसी भूमि को प्लाट के रूप में महंगे दामों पर बेचने का प्रयास किया जाता है।
ऐसे मामलों में सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब जमीन के स्वामित्व, रास्ते, कब्जे, सीमांकन या राजस्व अभिलेखों को लेकर पहले से विवाद हो। बाद में जब प्लाट खरीदार सामने आते हैं तो विवाद कई परिवारों और दर्जनों लोगों तक फैल सकता है। बरियावन की घटना ने इसी तरह के संभावित भू-कारोबार की जांच की जरूरत को और बढ़ा दिया है।
अगर नेटवर्क बड़ा है तो सिर्फ दो नामों से नहीं खुलेगा राज
बरियावन मामले में पुलिस ने जिन दो आरोपियों को कार्रवाई की प्रमुख कड़ी माना है, उनके खिलाफ कार्रवाई अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि इनके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क है तो उसकी जांच भी उतनी ही जरूरी है।
किसने जमीन की पहचान की? किसने किसानों से संपर्क कराया? किसके माध्यम से एग्रीमेंट हुए? प्लाटिंग का पूरा ढांचा किसने तैयार किया?
जेसीबी और लोगों को मौके पर किसने बुलाया? विवादित भूमि को लेकर किस स्तर पर बातचीत हुई?और सबसे अहम इस पूरे खेल से आर्थिक लाभ किसे मिलने वाला था?
इन सवालों के जवाब ही यह स्पष्ट कर सकते हैं कि बरियावन की घटना महज स्थानीय भूमि विवाद थी या इसके पीछे जमीन के कारोबार से जुड़ा कोई बड़ा नेटवर्क सक्रिय था।
बरियावन की घटना के बाद पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जांच को केवल सामने आए आरोपियों तक सीमित न रखा जाए। यदि जांच में किसी बड़े नेटवर्क अथवा अन्य लोगों की भूमिका के संकेत मिलते हैं तो पुलिस को दस्तावेजी और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर उसकी तह तक पहुंचना चाहिए। सूत्रों के अनुसार, कथित सरगना तक पुलिस की पहुंच अभी नहीं बन सकी है। ऐसे में यह सवाल बना हुआ है कि आखिर इतने बड़े घटनाक्रम के पीछे किसका हाथ है। हालांकि, इस संबंध में अंतिम स्थिति पुलिस की विस्तृत जांच और साक्ष्यों के सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
बरियावन की घटना ने एक बड़ा सवाल सामने खड़ा कर दिया है क्या यह सिर्फ करीब 15 आशियानों के उजड़ने की कहानी है या फिर इसके पीछे जमीन के कारोबार का कोई बड़ा नेटवर्क भी सक्रिय है?
इस सवाल का जवाब तभी सामने आएगा, जब जांच आरोपियों की संख्या गिनने तक सीमित न रहकर पूरे नेटवर्क, जमीन के दस्तावेजों, आर्थिक लेनदेन और कथित सरगना तक पहुंचे। फिलहाल निगाहें पुलिस और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।




