खाद की कालाबाजारी से हलकान किसान: फुटकर दुकानदार लाचार, थोक विक्रेताओं पर नहीं प्रशासन की नजर

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बस्ती। जिले के किसान इन दिनों खाद की भारी किल्लत और कालाबाजारी से परेशान हैं। एक ओर जहां खेतों में बोआई का समय सिर पर है, वहीं दूसरी ओर खाद की कालाबाजारी ने उनकी परेशानी को कई गुना बढ़ा दिया है। हैरानी की बात यह है कि प्रशासन की सख्ती सिर्फ फुटकर दुकानदारों तक सीमित है, जबकि असली लूट का खेल थोक विक्रेताओं के गोदामों में चल रहा है।


जिले के प्रमुख थोक विक्रेताओं बालाजी, सत्य नारायण एंड सन, और राम चंद्र गुप्ता पर किसानों और फुटकर विक्रेताओं ने बड़े पैमाने पर कालाबाजारी के आरोप लगाए हैं। इन थोक विक्रेताओं को सरकार द्वारा तय मूल्य 242 रुपये प्रति बोरी की दर से यूरिया खाद दी जाती है, लेकिन वे इसे 260 से 265 रुपये में फुटकर दुकानदारों को बेच रहे हैं। मजबूरी में फुटकर दुकानदार जब इसे अपनी दुकान तक पहुंचाते हैं तो ढुलाई और अन्य खर्चा जोड़कर वही खाद 280 से 290 रुपये में बैठती है।


यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब यही खाद किसानों तक पहुंचती है। सरकार द्वारा निर्धारित दर 266.50 रुपये प्रति बोरी है, लेकिन खुले बाजार में यह 450 से 500 रुपये तक में बिक रही है। इससे साफ है कि बीच की पूरी चेन में जबरदस्त मुनाफाखोरी हो रही है, जिसमें सबसे बड़ा फायदा थोक विक्रेताओं को मिल रहा है।
प्रशासनिक अमला जांच के नाम पर केवल फुटकर दुकानदारों पर दबाव बनाता नजर आ रहा है। निरीक्षण, नोटिस और लाइसेंस रद्द करने की धमकी जैसे कदम सिर्फ गांव-कस्बों के छोटे दुकानदारों तक सीमित हैं। जबकि जिन थोक विक्रेताओं के गोदामों से यह गड़बड़ी शुरू होती है, उन पर प्रशासनिक आंखें मूंद रखी गई हैं।
खेतों में खाद की जरूरत और बाजार में उसके ऊंचे दाम से किसान खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। हरैया के किसान शिवचरण कहते हैं, “सरकार कहती है खाद सस्ती है, लेकिन हम 500 रुपये में खरीद रहे हैं। थोक व्यापारी मनमानी कर रहे हैं और हम कुछ कर भी नहीं सकते।” भानपुर के किसान राम विलास चौधरी का कहना है, ” धान की फसल में खाद की बोआई का समय है, खाद चाहिए लेकिन वह मादक पदार्थों की तरह तस्करी की जा रही है वहीं प्रशासन सिर्फ छोटे दुकानदारों को पकड़ कर खानापूर्ति कर रहा है।


पूरा मामला यह दिखाता है कि थोक व्यापारियों की लूट पर लगाम कसने के लिए न तो ठोस कार्रवाई हो रही है और न ही किसी तरह की निगरानी। प्रशासन की निष्क्रियता से न केवल किसानों को आर्थिक नुकसान हो रहा है, बल्कि खाद वितरण की पूरी प्रणाली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। किसान ने मांग की है कि जिले के सभी थोक विक्रेताओं के स्टॉक, रसीद और बिक्री रजिस्टर की जांच की जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि खाद की आपूर्ति वास्तव में निर्धारित मूल्य पर ही हो। फुटकर दुकानदारों को डराने के बजाय असली दोषियों पर कार्रवाई हो। निष्कर्ष साफ है जब तक थोक विक्रेताओं की लूट पर लगाम नहीं कसी जाएगी, तब तक खाद की समस्या से किसान यूं ही जूझते रहेंगे।


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