गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों के अधिकारों पर उठा बड़ा सवाल, क्षेत्राधिकारी का बयान बना चर्चा का विषय

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अवधी खबर संवाददाता

अंबेडकरनगर।
जनपद में गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों के अधिकार और उनकी भूमिका को लेकर एक बार फिर विवाद गहराता जा रहा है। जलालपुर क्षेत्राधिकारी अनूप कुमार सिंह का हालिया बयान इस बहस को और तेज कर गया है। क्षेत्राधिकारी ने कहा है कि “गैर मान्यता प्राप्त पत्रकार पत्रकार की श्रेणी में नहीं आते और उन्हें सरकारी संस्थानों में खबर कवरेज का कोई अधिकार नहीं है।” इस बयान से न केवल पत्रकार समाज में आक्रोश है, बल्कि संविधानिक अधिकारों को लेकर भी कई सवाल खड़े हो गए हैं।

मामले की जड़: नगपुर सीएचसी विवाद और एफआईआर

विवाद की शुरुआत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नगपुर जलालपुर से हुई, जहां एक गैर मान्यता प्राप्त पत्रकार पर सरकारी कार्य में बाधा और रंगदारी का आरोप लगाकर मुकदमा दर्ज कराया गया। सीएचसी अधीक्षक जयप्रकाश की तहरीर पर पुलिस ने केस दर्ज किया और पत्रकार की मान्यता स्थिति पूछी। जिला सूचना विभाग ने साफ किया कि संबंधित व्यक्ति राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त नहीं है, जिसके आधार पर पुलिस चार्जशीट दाखिल करने की तैयारी में है।

बड़ा सवाल: क्या पत्रकारिता मान्यता पर निर्भर है?

क्षेत्राधिकारी अनूप सिंह का बयान कि “गैर मान्यता प्राप्त पत्रकार सरकारी संस्थानों में सवाल-जवाब नहीं कर सकते” न केवल पत्रकारिता की आत्मा पर चोट है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) में निहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध भी प्रतीत होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, पत्रकारिता के लिए कानूनी मान्यता आवश्यक नहीं होती, बल्कि यह केवल सरकारी सुविधाओं (जैसे प्रेस कांफ्रेंस में प्राथमिकता, पास आदि) तक सीमित होती है।

सरकारी संस्थान की परिभाषा: अस्पष्टता का लाभ?

क्षेत्राधिकारी के बयान से यह सवाल भी उभरा है कि आखिर “सरकारी संस्थान” की स्पष्ट परिभाषा क्या है?
क्या अस्पताल, स्कूल, तहसील, थाना, ब्लॉक कार्यालय, या कोई भी विभागीय दफ्तर—सभी इस श्रेणी में आते हैं? जब तक इसकी स्पष्ट रूपरेखा तय नहीं की जाती, पत्रकारों और प्रशासन के बीच विवाद की स्थिति बनी रहेगी।

प्रेस कांफ्रेंस में आमंत्रण, फिर अधिकार से इंकार क्यों?

एक बड़ा विरोधाभास यह भी है कि गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों को प्रशासनिक प्रेस वार्ताओं में आमंत्रित किया जाता है, उनसे सवाल-जवाब लिए जाते हैं, लेकिन जब कोई विवाद उत्पन्न होता है तो उन्हें पत्रकार मानने से इनकार कर दिया जाता है। क्या यह केवल भीड़ बढ़ाने और अपनी छवि चमकाने का प्रयास है? या फिर यह मौन सहमति से दी गई स्वीकृति को संकट में डालने का तरीका?

पत्रकारों की मांग: स्पष्टता और संरक्षण

गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों ने मांग की है कि प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि कौन-कौन से स्थान सरकारी संस्थान की श्रेणी में आते हैं, और पत्रकारों के लिए कवरेज के क्या नियम हैं। साथ ही, प्रशासन से यह भी आग्रह किया गया है कि किसी भी पत्रकार पर फर्जी मुकदमे दर्ज न हों, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

समापन टिप्पणी: लोकतंत्र का प्रश्न

यह मुद्दा केवल किसी एक पत्रकार या किसी एक घटना तक सीमित नहीं है। यह पत्रकारिता की आज़ादी, प्रशासन की पारदर्शिता और लोकतंत्र की रक्षा से जुड़ा हुआ प्रश्न है। जब तक सरकारी संस्थानों की परिभाषा, गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों की भूमिका, और उनके अधिकारों पर संविधानिक स्पष्टता नहीं आती, तब तक यह विवाद बार-बार सिर उठाता रहेगा। समय आ गया है कि प्रशासन और पत्रकार समुदाय मिलकर इस पर पारदर्शी नीति बनाए, जिससे न केवल जनहित सुरक्षित रहे, बल्कि लोकतंत्र की चौथी स्तंभ—पत्रकारिता—भी मजबूत हो सके।


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