सारंगपुर ग्राम सभा में कूड़ा गाड़ी की मरम्मत के नाम पर 64 हजार, राबिस के लिए 92 हजार और इंटरलॉकिंग पर 1.65 लाख रुपये का भुगतान
ग्रामीणों के बयानों और स्थलीय पड़ताल में सामने आईं खामियां, जांच अधिकारियों ने कार्यों को बताया सही
प्रमोद कुमार वर्मा
अम्बेडकरनगर (अवधी खबर)। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जीरो टॉलरेंस नीति के बावजूद सरकारी योजनाओं में कथित अनियमितताओं के मामले सामने आ रहे हैं। कटेहरी विकासखंड की सारंगपुर ग्राम सभा में विकास कार्यों के नाम पर किए गए भुगतानों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कूड़ा गाड़ी की मरम्मत से लेकर सड़क पर राबिस डालने और इंटरलॉकिंग कार्य तक, तीन मदों में कुल 3 लाख 21 हजार रुपये के भुगतान पर ग्रामीणों ने सवाल उठाए हैं। हैरानी की बात यह है कि शिकायत के बाद हुई जांच में संबंधित कार्यों को सही बताया गया, जबकि ग्रामीणों के बयानों और मीडिया की स्थलीय पड़ताल में कई बिंदुओं पर विरोधाभास सामने आने का दावा किया जा रहा है।

कूड़ा घर बना नहीं, कूड़ा गाड़ी की मरम्मत पर 64 हजार का भुगतान
सारंगपुर ग्राम सभा में ई-रिक्शा (कूड़ा गाड़ी) की मरम्मत के नाम पर 64 हजार रुपये का भुगतान किए जाने की जानकारी सामने आई है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव में अभी तक आरसी सेंटर अथवा कूड़ा घर का निर्माण नहीं हुआ है। ग्रामीणों के मुताबिक, कूड़ा गाड़ी से घरों से कूड़ा उठाने का काम भी नहीं किया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब कूड़ा संग्रहण की व्यवस्था ही धरातल पर नजर नहीं आ रही, बिना कूड़ा गाड़ी सड़क पर चले ही उसका मरम्मत कार्य कैसे आ गया मरम्मत के नाम पर इतनी बड़ी धनराशि किस आधार पर खर्च की गई? जो सभी के गले के नीचे यह बात नहीं उतर रही है।
आठ ट्राली राबिस का दावा, भुगतान 92 हजार रुपये
ग्राम सभा में पंचायत भवन से छोटू की दुकान तक सड़क पर राबिस और ईंट के टुकड़े डालने के कार्य को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। ग्रामीणों के अनुसार, सड़क पर करीब सात से आठ ट्राली राबिस ही डाली गई। ग्रामीण ग्रामीण केशवराम ने बताया कि ईंट के टुकड़े भी आए थे, लेकिन बाद में वे कहां गए, इसकी जानकारी नहीं है। दूसरी ओर, इस कार्य के नाम पर 92 हजार रुपये का भुगतान किए जाने की बात सामने आई है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें भुगतान की राशि और कार्य के खर्च की जानकारी तक नहीं थी। फिलहाल इतना ज्यादा भुगतान किया गया है जो गलत तरीके से ग्राम सभा का पैसा निकाला गया है ग्रामीण केशवराम,रुकुम केश वर्मा, प्रमोद, राम प्रकाश समेत आधा दर्जन ग्रामीणों ने सड़क पर राविस डालने व कूड़ा गाड़ी पर खर्च को लेकर सवाल उठाए हैं।

इंटरलॉकिंग में अधूरे काम पर भुगतान का आरोप
ग्राम सभा में होलिका दहन स्थल से हनुमान मंदिर तक इंटरलॉकिंग कार्य पर भी 1 लाख 65 हजार रुपये का भुगतान किए जाने की जानकारी सामने आई है। स्थलीय पड़ताल के दौरान इंटरलॉकिंग के किनारे बनने वाले बॉर्डर पर पीसीसी कार्य नहीं होने की बात सामने आने का दावा किया गया है। यदि कार्य वास्तव में अधूरा है, तो उसके बावजूद भुगतान किस आधार पर किया गया? इसका जवाब संबंधित विभागीय अधिकारियों को देना चाहिए। कार्य की गुणवत्ता, माप पुस्तिका और भुगतान संबंधी अभिलेखों की जांच से ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
प्रशासक और सचिव की जिम्मेदारी पर सवाल
सारंगपुर ग्राम सभा में प्रशासक के रूप में सहायक खंड विकास अधिकारी दुर्गा प्रसाद पांडेय तथा सचिव के रूप में मांडवी उपाध्याय के कार्यरत होने की जानकारी है। ऐसे में ग्राम सभा के विकास कार्यों की निगरानी, भुगतान की प्रक्रिया और कार्यों की गुणवत्ता को लेकर उनकी भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए। हालांकि, किसी अधिकारी या कर्मचारी की संलिप्तता अथवा दोष सिद्ध होने के संबंध में अंतिम निष्कर्ष निष्पक्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकता है।
जांच में कार्य सही, फिर ग्रामीणों के सवालों का जवाब कौन देगा?
मामले की शिकायत के बाद सहायक विकास अधिकारी (आरडी) अनिल कुमार सिंह, अवर अभियंता लघु सिंचाई रामजीत तथा अवर अभियंता (ग्रा.अ.वि.) अतुल मौर्य द्वारा जांच किए जाने की जानकारी सामने आई है। आरोप है कि जांच में संबंधित कार्यों को पूरी तरह सही दर्शाया गया। वहीं, ग्रामीणों के बयान और स्थलीय पड़ताल में सामने आए तथ्यों को लेकर विरोधाभास होने का दावा किया जा रहा है।


ऐसे में जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि कार्य मौके पर मानक के अनुरूप हुए हैं, तो संबंधित अधिकारियों को अभिलेखों, माप पुस्तिका, भुगतान विवरण और भौतिक सत्यापन के आधार पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। वहीं, यदि भुगतान और धरातल पर हुए कार्यों में अंतर मिलता है, तो जिम्मेदारों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस नीति की असली परीक्षा
कटेहरी विकासखंड की सारंगपुर ग्राम सभा का मामला सरकारी धन के उपयोग और विकास कार्यों की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ग्रामीणों का आरोप है कि विकास के नाम पर भुगतान तो किया जा रहा है, लेकिन धरातल पर काम की वास्तविक स्थिति अलग दिखाई दे रही है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस मामले में दोबारा निष्पक्ष जांच कराता है या पहले की जांच रिपोर्ट के आधार पर ही मामला समाप्त मान लिया जाएगा। ग्रामीणों को उम्मीद है कि सरकारी धन के खर्च का पूरा हिसाब सामने आएगा और अनियमितता मिलने पर जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई होगी।




