कतर में 20 घंटे काम और बदसलूकी से टूट गए थे अजीत, सैयद आबिद हुसैन, भारतीय दूतावास और विदेश मंत्रालय की पहल से 6 अक्टूबर को सुरक्षित पहुंचे भारत
अवधी खबर संवाददाता
अमेठी। रोजी-रोटी की तलाश में विदेश जाना अजीत कुमार के लिए बेहतर जिंदगी का सपना था, लेकिन कतर पहुंचते ही यह सपना एक ऐसी मुश्किल में बदल गया, जहां हर दिन संघर्ष और हर रात घर लौटने की बेचैनी में गुजरने लगी। नौकरी का झांसा देने वाले एजेंट के वादे और हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर निकला।
आठ घंटे काम के वादे पर कतर पहुंचे अजीत को कथित तौर पर करीब 20 घंटे काम करने के लिए मजबूर किया गया। खाने तक के लिए तय भत्ता नहीं मिला और बदसलूकी ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दीं।
अमेठी निवासी अजीत कुमार लखनऊ के गोमतीनगर क्षेत्र के एक एजेंट के माध्यम से दोहा पहुंचे थे। एजेंट ने उन्हें एक स्पॉन्सर के घर पर आठ घंटे काम के बदले 1,600 कतरी रियाल वेतन और 250 कतरी रियाल भोजन भत्ता दिलाने का भरोसा दिया था। लेकिन कतर पहुंचने के बाद परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं।
अजीत के मुताबिक, उनसे निर्धारित समय से कई गुना अधिक काम कराया जाने लगा। भोजन के लिए भी कोई भत्ता या पर्याप्त पैसा नहीं दिया गया। लगातार काम और कथित दुर्व्यवहार के कारण वह शारीरिक और मानसिक रूप से टूटने लगे। ऐसे में उन्हें सिर्फ एक उम्मीद दिखाई दे रही थी—किसी तरह अपने वतन वापस लौटना।
भाई की एक कॉल बनी उम्मीद की किरण
अजीत की हालत की जानकारी मिलने के बाद उनके भाई रवि ने 12 सितंबर को सामाजिक कार्यकर्ता सैयद आबिद हुसैन से संपर्क किया। विदेशों में संकट में फंसे भारतीयों की मदद के लिए सक्रिय आबिद हुसैन ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तत्काल भारतीय दूतावास, दोहा और विदेश मंत्रालय के प्रवासी भारतीय सहायता केंद्र की मदद टीम से संपर्क किया।
इसके बाद मामले में तेजी आई। भारतीय अधिकारियों और स्थानीय एजेंसियों के सहयोग से अजीत को नियोक्ता के घर से बाहर निकालकर भारतीय दूतावास तक पहुंचाया गया, जहां उनके मामले को औपचारिक रूप से दर्ज किया गया। आगे भारतीय दूतावास और कतर की सीआईडी की संयुक्त कार्रवाई से उनकी स्वदेश वापसी का रास्ता तैयार हुआ।
छह अक्टूबर को लौटा वतन, परिवार में लौटी मुस्कान
लगातार प्रयासों के बाद 6 अक्टूबर को अजीत कुमार सुरक्षित भारत लौट आए। महीनों की चिंता, बेबसी और घर लौटने की आस के बाद जब अजीत अपने देश की धरती पर पहुंचे तो परिवार के लिए यह किसी बड़ी राहत से कम नहीं था।
भारत लौटने के अगले दिन 7 अक्टूबर को अजीत ने वीडियो जारी कर अपनी आपबीती साझा की और सैयद आबिद हुसैन तथा भारतीय दूतावास के प्रति आभार जताया। इस पूरे घटनाक्रम में मानवीय संवेदना की एक तस्वीर भी सामने आई—मुसीबत में फंसे एक भारतीय की आवाज सीमा पार तक पहुंची और मदद के प्रयासों ने उसे फिर अपने परिवार के बीच पहुंचा दिया।
सैयद आबिद हुसैन ने अजीत की सुरक्षित वापसी में सहयोग के लिए भारतीय दूतावास, दोहा और विदेश मंत्रालय के प्रवासी भारतीय सहायता केंद्र व मदद टीम का आभार जताया। उन्होंने विदेश में रोजगार के इच्छुक लोगों से अपील की कि विदेश जाना गलत नहीं है, लेकिन किसी एजेंट के झांसे में आकर बिना पूरी जांच-पड़ताल के कदम उठाना जिंदगी को मुश्किल में डाल सकता है।
विदेश जाने से पहले नौकरी, वेतन, काम के घंटे, नियोक्ता और वीजा से जुड़ी सभी शर्तों की पूरी जानकारी हासिल करना जरूरी है। क्योंकि बेहतर जिंदगी की तलाश में उठाया गया एक कदम तभी सार्थक है, जब उसके साथ सुरक्षा, सम्मान और भरोसे की गारंटी भी हो।




