मनरेगा में फिर महाघोटाला, नियमों को ताक पर रखकर फर्जीवाड़ा

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फोटो को खींचकर लगाई जा रही हाजिरी

विकासखंड रामनगर के ग्राम मंसूरगंज का मामला

अवधी खबर संवाददाता

अम्बेडकर नगर।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को पारदर्शिता और जवाबदेही की मिसाल माना जाता है, लेकिन विकासखंड रामनगर अंतर्गत ग्राम सभा मंसूरगंज में सामने आए तथ्यों ने इस योजना की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि मनरेगा के नियमों का खुला उल्लंघन करते हुए एक ही व्यक्ति को दो-दो मास्टर रोल में कार्यरत दिखाकर सरकारी धन के दुरुपयोग की कोशिश की गई।

मनरेगा के दिशा-निर्देशों के अनुसार कोई भी मजदूर एक ही समय में केवल एक मास्टर रोल पर ही काम कर सकता है। इसके बावजूद ग्राम मंसूरगंज में मनरेगा के तहत दो अलग-अलग मास्टर रोल में 14 मजदूरों के कार्य करने का विवरण दर्ज है, जबकि वास्तविक स्थिति यह बताई जा रही है कि एक ही व्यक्ति को दोनों मास्टर रोल में ड्यूटी करते हुए दिखाया गया है। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि पूर्व नियोजित अनियमितता की ओर संकेत करता है।

मामले की गंभीरता इस तथ्य से और बढ़ जाती है कि एक ही व्यक्ति की फोटो दोनों मास्टर रोल में अपलोड की गई है, जबकि नाम अलग-अलग दर्ज किए गए हैं, जिससे फर्जी मजदूर दिखाकर भुगतान निकालने की आशंका प्रबल होती है। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि मनरेगा की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड की गई तस्वीरों का बारीकी से अवलोकन किया जाए तो एक ही फोटो कई दिनों से लगातार उपयोग में लाई जा रही है।

नियमानुसार कार्यस्थल पर काम करते हुए मजदूर की वर्तमान समय की जियो-टैग फोटो अपलोड की जानी चाहिए, ताकि कार्य की वास्तविकता सिद्ध हो सके। इसके विपरीत यहां पहले से अपलोड फोटो की दोबारा फोटो खींचकर वेबसाइट पर डालने की बात सामने आ रही है, जो तकनीकी व्यवस्था का दुरुपयोग और भ्रष्टाचार की खुली मिसाल है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह पूरा मामला केवल मजदूरी भुगतान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे प्रधानी की तैयारी और राजनीतिक लाभ का उद्देश्य भी हो सकता है। मनरेगा के माध्यम से निकाली गई धनराशि यदि निजी या चुनावी खर्चों में प्रयुक्त की जा रही है, तो यह न केवल सरकारी धन की लूट है, बल्कि ग्रामीण मजदूरों के संवैधानिक अधिकारों पर भी चोट है।

इस पूरे प्रकरण में ग्राम प्रधान, रोजगार सेवक, तकनीकी सहायक और कार्यक्रम अधिकारी की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है। बिना इनकी जानकारी या मिलीभगत के न तो एक ही फोटो बार-बार अपलोड हो सकती है और न ही अलग-अलग नामों से मास्टर रोल तैयार हो सकते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि निगरानी तंत्र या तो निष्क्रिय है या फिर जानबूझकर आंखें मूंदे हुए है।

ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए, मास्टर रोल, जॉब कार्ड, फोटो सत्यापन और भुगतान की भौतिक जांच हो, दोषी पाए जाने पर संबंधितों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर कड़ी कार्रवाई की जाए, तथा गलत तरीके से निकाली गई धनराशि की रिकवरी सुनिश्चित की जाए।

मनरेगा जैसी जनकल्याणकारी योजना में यदि इस प्रकार की अनियमितताओं पर समय रहते रोक नहीं लगाई गई, तो जनता का भरोसा व्यवस्था से उठ जाएगा। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेकर दोषियों पर कार्रवाई करता है, या फिर यह मामला भी अन्य घोटालों की तरह कागजों में दबकर रह जाएगा।


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