कागजों पर फर्म, ज़मीन पर कुछ नहीं: अम्बेडकर नगर में GST पंजीकरण की आड़ में पंचायत धन की संगठित लूट

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बसखारी विकास खंड में दर्जनों फर्जी फर्मों से बिना अस्तित्व सामग्री आपूर्ति,

बिना दिनांक व एक जैसे सीरियल नंबर वाले बिलों से निकाला जा रहा सरकारी धन,

GST विभाग की निगरानी व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

अवधी खबर संवाददाता

अम्बेडकर नगर।
जनपद अम्बेडकर नगर में वस्तु एवं सेवा कर (GST) पंजीकरण की प्रक्रिया और ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के भुगतान को लेकर गंभीर अनियमितताओं के संकेत मिले हैं। विकास खंड बसखारी सहित कई क्षेत्रों में ऐसी फर्मों का पंजीकरण सामने आया है, जिनका न तो कोई स्थायी व्यवसायिक स्थल है और न ही वास्तविक रूप से कोई व्यापारिक गतिविधि संचालित होती दिखाई देती है।

नियमों के अनुसार GST रजिस्ट्रेशन के समय व्यवसाय का पता, बैंक खाता, व्यवसाय की प्रकृति एवं पहचान से जुड़े कई स्तरों पर सत्यापन किया जाना आवश्यक होता है। इसके बावजूद मीडिया सर्वे में सामने आया है कि दर्जनों फर्में केवल कागजों पर संचालित हैं और उनका उपयोग ग्राम पंचायतों के विकास कार्यों में सामग्री आपूर्ति के नाम पर भुगतान निकासी के लिए किया जा रहा है।

इ ग्राम स्वराज पर उपलब्ध डाटा के अनुसार, ग्राम पंचायत सचिवों और प्रधानों की मिलीभगत से इन फर्मों के खातों में बार-बार भुगतान किया गया। जांच में यह भी पाया गया कि बड़ी संख्या में भुगतान बिना दिनांक वाले बिल-वाउचर के आधार पर किए गए हैं, जबकि कुछ मामलों में एक ही सीरियल नंबर वाले बिलों का बार-बार प्रयोग किया गया, जो स्पष्ट रूप से वित्तीय नियमों और कर कानूनों का उल्लंघन है।

मीडिया सर्वे में सामने आया कि विकास कार्यों में आपूर्ति दिखाने वाली लगभग 80 प्रतिशत फर्में बिना दिनांक के बिल जारी कर रही हैं, जबकि करीब 2 प्रतिशत फर्मों के सभी बिलों पर एक ही सीरियल नंबर अंकित है। यह स्थिति न केवल फर्जीवाड़े की ओर इशारा करती है, बल्कि ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर अपलोड किए गए दस्तावेजों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करती है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ फर्में गांवों के विकास कार्यों से लेकर कार्यालयी सामग्री जैसे स्टेशनरी, इलेक्ट्रॉनिक सामान, सरिया, सीमेंट, गिट्टी, पीवीसी पाइप, चूना, ब्लीचिंग पाउडर, टेंट-हाउस, कुर्सी-मेज आदि की आपूर्ति एक साथ दिखा रही हैं, जबकि जमीनी हकीकत में उनका तथाकथित कार्यालय मात्र एक छोटे से कमरे तक सीमित पाया गया है।

प्रश्न यह भी उठता है कि वस्तु एवं सेवा कर विभाग द्वारा समय-समय पर की जाने वाली भौतिक जांच और डाटा विश्लेषण की प्रक्रिया आखिर कितनी प्रभावी है। यदि जांच होती भी है, तो क्या वह केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है यह सवाल अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बन चुका है।

मीडिया सर्वे अभी जारी है और जल्द ही नाम, भुगतान विवरण और दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ पूरे मामले को सार्वजनिक किया जाएगा। यह प्रकरण ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों की वास्तविक स्थिति और सरकारी निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।


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