अवधी खबर संवाददाता
अम्बेडकर नगर।
विकासखंड बसखारी की ग्राम सभा पृथ्वीपुर में पंचायत व्यवस्था की हकीकत एक बार फिर सवालों के घेरे में है। सरकारी दावों और जमीनी सच्चाई के बीच फासला इतना गहरा है कि हर बार की तरह इस बार भी ग्राम पंचायत भवन पर ताला लटका मिला। ग्रामीण जब अपनी समस्याएं लेकर पंचायत भवन पहुंचे तो उन्हें निराशा ही हाथ लगी। पंचायत भवन बंद होने के संबंध में जब पंचायत सहायक से फोन पर संपर्क किया गया तो उन्होंने बताया कि वे सर्वे कार्य में व्यस्त हैं। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई पहली बार नहीं है। पंचायत भवन का लगातार बंद रहना यह संकेत देता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि कर्मचारी केवल हाजिरी दर्ज कराकर नदारद हो जाते हों। यह स्थिति प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करती है।
सचिव की गैरहाजिरी और ‘मुंशी सिस्टम
मामले में तब और गंभीर मोड़ आ गया जब पंचायत सहायक ने यह स्वीकार किया कि ग्राम पंचायत सचिव एकता यादव पंचायत भवन लगभग कभी नहीं आतीं और पंचायत से जुड़े अधिकांश कार्य एक कथित मुंशी द्वारा कराए जाते हैं। सवाल यह है कि जब शासन ने ग्राम पंचायत सचिव के लिए किसी सरकारी मुंशी का प्रावधान ही नहीं किया है, तो फिर यह प्राइवेट व्यक्ति सरकारी फाइलों और दस्तावेजों का कामकाज किस अधिकार से कर रहा है?
सरकारी कार्यों को निजी व्यक्ति से कराना नियमों के विपरीत है। इसके बावजूद यदि पंचायत के अभिलेख, भुगतान से जुड़ी प्रक्रियाएं और ई-ग्राम स्वराज पोर्टल से संबंधित कार्य किसी प्राइवेट व्यक्ति के हाथों में हैं, तो यह प्रशासनिक नियमों के खुले उल्लंघन का मामला बनता है। यह भी जांच का विषय है कि संबंधित अधिकारियों की जानकारी में यह सब हो रहा है या नहीं। सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि उस कथित मुंशी का खर्च आखिर कहां से वहन किया जा रहा है, जबकि सरकार मुंशी के नाम पर कोई भुगतान नहीं करती। क्या यह खर्च ग्राम पंचायत के धन से किया जा रहा है? यदि ऐसा है, तो यह सीधे तौर पर सरकारी धन के दुरुपयोग की श्रेणी में आएगा।
सूत्रों के अनुसार ग्राम पंचायत सचिव का वेतन 50 हजार रुपये से अधिक नहीं है, लेकिन इसके बावजूद लग्जरी वाहन और सुविधासंपन्न जीवनशैली चर्चाओं में है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह सब पंचायत निधि के कथित दुरुपयोग का नतीजा है?
लगातार सामने आ रही अनियमितताओं से ग्राम सभा पृथ्वीपुर के ग्रामीणों में रोष है। ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत भवन खुला रहता तो उनकी समस्याएं समय पर सुनी जातीं। अब वे पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, पंचायत अभिलेखों की जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
सरकार भले ही पंचायत व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के बड़े-बड़े दावे करे, लेकिन पृथ्वीपुर का यह मामला उन दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है। अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इस मामले में कब और क्या कार्रवाई करता है।